श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! बरसातके चार महीने बीत गये। परन्तु अनिरुद्धजीका कहीं पता न चला। उनके घरके लोग, इस घटनासे बहुत ही शोकाकुल हो रहे थे॥ १॥
अपश्यतां चानिरुद्धं तद्बन्धूनां च भारत।
चत्वारो वार्षिका मासा व्यतीयुरनुशोचताम्॥ १
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! बरसातके चार महीने बीत गये। परन्तु अनिरुद्धजीका कहीं पता न चला। उनके घरके लोग, इस घटनासे बहुत ही शोकाकुल हो रहे थे॥ १॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.63.1 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 530) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/63/1/