॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.62.34
जिघृक्षया तान् परितः प्रसर्पतः
शुनो यथा सूकरयूथपोऽहनत्।
ते हन्यमाना भवनाद् विनिर्गता
निर्भिन्नमूर्धोरुभुजाः प्रदुद्रुवुः॥ ३४
jighṛkṣayā tān paritaḥ prasarpataḥ
śuno yathā sūkarayūthapo'hanat|
te hanyamānā bhavanād vinirgatā
nirbhinnamūrdhorubhujāḥ pradudruvuḥ|| 34
अर्थ
बाणासुरके साथ आये हुए सैनिक उनको पकड़नेके लिये ज्यों-ज्यों उनकी ओर झपटते, त्यों-त्यों वे उन्हें मार-मारकर गिराते जाते—ठीक वैसे ही, जैसे सूअरोंके दलका नायक कुत्तोंको मार डाले! अनिरुद्धजीकी चोटसे उन सैनिकोंके सिर, भुजा, जंघा आदि अंग टूट-फूट गये और वे महलोंसे निकल भागे॥ ३४॥