श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.62.34

दशम स्कन्ध · अध्याय 62 · अथ द्विषष्टितमोऽध्यायः

जिघृक्षया तान् परितः प्रसर्पतः

शुनो यथा सूकरयूथपोऽहनत्।

ते हन्यमाना भवनाद् विनिर्गता

निर्भिन्‍नमूर्धोरुभुजाः प्रदुद्रुवुः॥ ३४

jighṛkṣayā tān paritaḥ prasarpataḥ

śuno yathā sūkarayūthapo'hanat|

te hanyamānā bhavanād vinirgatā

nirbhinnamūrdhorubhujāḥ pradudruvuḥ|| 34

अर्थ

बाणासुरके साथ आये हुए सैनिक उनको पकड़नेके लिये ज्यों-ज्यों उनकी ओर झपटते, त्यों-त्यों वे उन्हें मार-मारकर गिराते जाते—ठीक वैसे ही, जैसे सूअरोंके दलका नायक कुत्तोंको मार डाले! अनिरुद्धजीकी चोटसे उन सैनिकोंके सिर, भुजा, जंघा आदि अंग टूट-फूट गये और वे महलोंसे निकल भागे॥ ३४॥

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