श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.62.32

दशम स्कन्ध · अध्याय 62 · अथ द्विषष्टितमोऽध्यायः

दीव्यन्तमक्षैः प्रिययाभिनृम्णया

तदंगसंगस्तनकुंकुमस्रजम् ।

बाह्वोर्दधानं मधुमल्लिकाश्रितां

तस्याग्र आसीनमवेक्ष्य विस्मितः॥ ३२

dīvyantamakṣaiḥ priyayābhinṛmṇayā

tadaṃgasaṃgastanakuṃkumasrajam |

bāhvordadhānaṃ madhumallikāśritāṃ

tasyāgra āsīnamavekṣya vismitaḥ|| 32

अर्थ

अनिरुद्धजी उस समय अपनी सब ओरसे सज-धजकर बैठी हुई प्रियतमा ऊषाके साथ पासे खेल रहे थे। उनके गलेमें बसंती बेलाके बहुत सुन्दर पुष्पोंका हार सुशोभित हो रहा था और उस हारमें ऊषाके अंगका सम्पर्क होनेसे उसके वक्षःस्थलकी केशर लगी हुई थी। उन्हें ऊषाके सामने ही बैठा देखकर बाणासुर विस्मित—चकित हो गया॥ ३२॥

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