॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.62.31
कामात्मजं तं भुवनैकसुन्दरं
श्यामं पिशंगाम्बरमम्बुजेक्षणम्।
बृहद्भुजं कुण्डलकुन्तलत्विषा
स्मितावलोकेन च मण्डिताननम्॥ ३१
kāmātmajaṃ taṃ bhuvanaikasundaraṃ
śyāmaṃ piśaṃgāmbaramambujekṣaṇam|
bṛhadbhujaṃ kuṇḍalakuntalatviṣā
smitāvalokena ca maṇḍitānanam|| 31
अर्थ
प्रिय परीक्षित्! अनिरुद्धजी स्वयं कामावतार प्रद्युम्नजीके पुत्र थे। त्रिभुवनमें उनके जैसा सुन्दर और कोई न था। साँवरा-सलोना शरीर और उसपर पीताम्बर फहराता हुआ, कमलदलके समान बड़ी-बड़ी कोमल आँखें, लम्बी-लम्बी भुजाएँ, कपोलोंपर घुँघराली अलकें और कुण्डलोंकी झिलमिलाती हुई ज्योति, होठोंपर मन्द-मन्द मुसकान और प्रेमभरी चितवनसे मुखकी शोभा अनूठी हो रही थी॥ ३१॥