श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.62.30

दशम स्कन्ध · अध्याय 62 · अथ द्विषष्टितमोऽध्यायः

ततः प्रव्यथितो बाणो दुहितुः श्रुतदूषणः।

त्वरितः कन्यकागारं प्राप्तोऽद्राक्षीद् यदूद्वहम्॥ ३०

tataḥ pravyathito bāṇo duhituḥ śrutadūṣaṇaḥ|

tvaritaḥ kanyakāgāraṃ prāpto'drākṣīd yadūdvaham|| 30

अर्थ

परीक्षित्! पहरेदारोंसे यह समाचार जानकर कि कन्याका चरित्र दूषित हो गया है, बाणासुरके हृदयमें बड़ी पीड़ा हुई। वह झटपट ऊषाके महलमें जा धमका और देखा कि अनिरुद्धजी वहाँ बैठे हुए हैं॥ ३०॥

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