श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! प्रद्युम्नजी मूर्तिमान् कामदेव थे। उनके सौन्दर्य और गुणोंपर रीझकर रुक्मवतीने स्वयंवरमें उन्हींको वरमाला पहना दी। प्रद्युम्नजीने युद्धमें अकेले ही वहाँ इकट्ठे हुए नरपतियोंको जीत लिया और रुक्मवतीको हर लाये॥ २२॥✎ 1695
वृतः स्वयंवरे साक्षादनंगोऽङ्गयुतस्तया।
राज्ञः समेतान् निर्जित्य जहारैकरथो युधि॥ २२
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! प्रद्युम्नजी मूर्तिमान् कामदेव थे। उनके सौन्दर्य और गुणोंपर रीझकर रुक्मवतीने स्वयंवरमें उन्हींको वरमाला पहना दी। प्रद्युम्नजीने युद्धमें अकेले ही वहाँ इकट्ठे हुए नरपतियोंको जीत लिया और रुक्मवतीको हर लाये॥ २२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.61.22 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 522) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/61/22/
टिप्पणियाँ
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प्राचीन प्रतिमें ‘वृतः स्वयंवरे..........रथो युधि’ यह श्लोक ‘यद्यप्यनुस्मरन्...’ इस तेईसवें श्लोकके बाद है।