॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.61.21
अनागतमतीतं च वर्तमानमतीन्द्रियम्।
विप्रकृष्टं व्यवहितं सम्यक् पश्यन्ति योगिनः॥ २१
anāgatamatītaṃ ca vartamānamatīndriyam|
viprakṛṣṭaṃ vyavahitaṃ samyak paśyanti yoginaḥ|| 21
अर्थ
आपसे कोई बात छिपी नहीं है। क्योंकि योगीजन भूत, भविष्य और वर्तमानकी सभी बातें भलीभाँति जानते हैं। उनसे ऐसी बातें भी छिपी नहीं रहतीं; जो इन्द्रियोंसे परे हैं, बहुत दूर हैं अथवा बीचमें किसी वस्तुकी आड़ होनेके कारण नहीं दीखतीं॥ २१॥