श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.61.20

दशम स्कन्ध · अध्याय 61 · अथैकषष्टितमोऽध्यायः

राजोवाच

कथं रुक्म्यरिपुत्राय प्रादाद् दुहितरं युधि।

कृष्णेन परिभूतस्तं२ हन्तुं रन्ध्रं प्रतीक्षते।

एतदाख्याहि मे विद्वन् द्विषोर्वैवाहिकं मिथः॥ २०

kathaṃ rukmyariputrāya prādād duhitaraṃ yudhi|

kṛṣṇena paribhūtastaṃ hantuṃ randhraṃ pratīkṣate|

etadākhyāhi me vidvan dviṣorvaivāhikaṃ mithaḥ|| 20

अर्थ

राजा परीक्षित‍्ने पूछा—परम ज्ञानी मुनीश्‍वर! भगवान् श्रीकृष्णने रणभूमिमें रुक्मीका बड़ा तिरस्कार किया था। इसलिये वह सदा इस बातकी घातमें रहता था कि अवसर मिलते ही श्रीकृष्णसे उसका बदला लूँ और उनका काम तमाम कर डालूँ। ऐसी स्थितिमें उसने अपनी कन्या रुक्मवती अपने शत्रुके पुत्र प्रद्युम्‍नजीको कैसे ब्याह दी? कृपा करके बतलाइये! दो शत्रुओंमें—श्रीकृष्ण और रुक्मीमें फिरसे परस्पर वैवाहिक सम्बन्ध कैसे हुआ?॥ २०॥

टिप्पणियाँ

  1. २

    तोऽसौ।

     

    (मुद्रित पृष्ठ 522)

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