श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.61.23

दशम स्कन्ध · अध्याय 61 · अथैकषष्टितमोऽध्यायः

यद्यप्यनुस्मरन् वैरं रुक्मी कृष्णावमानितः।

व्यतरद् भागिनेयाय सुतां कुर्वन् स्वसुः प्रियम्॥ २३

yadyapyanusmaran vairaṃ rukmī kṛṣṇāvamānitaḥ|

vyatarad bhāgineyāya sutāṃ kurvan svasuḥ priyam|| 23

अर्थ

यद्यपि भगवान् श्रीकृष्णसे अपमानित होनेके कारण रुक्मीके हृदयकी क्रोधाग्‍नि शान्त नहीं हुई थी, वह अब भी उनसे वैर गाँठे हुए था, फिर भी अपनी बहिन रुक्मिणीको प्रसन्‍न करनेके लिये उसने अपने भानजे प्रद्युम्‍नको अपनी बेटी ब्याह दी॥ २३॥

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