श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.60.5

दशम स्कन्ध · अध्याय 60 · अथ षष्टितमोऽध्यायः

पारिजातवनामोदवायुनोद्यानशालिना ।

धूपैरगुरुजै राजन् जालरन्ध्रविनिर्गतैः॥ ५

pārijātavanāmodavāyunodyānaśālinā |

dhūpairagurujai rājan jālarandhravinirgataiḥ|| 5

अर्थ

उद्यानमें पारिजातके उपवनकी सुगन्ध लेकर मन्द-मन्द शीतल वायु चल रही थी। झरोखोंकी जालियोंमेंसे अगरके धूपका धूआँ बाहर निकल रहा था॥ ५॥✎ 1437 2116 2117

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)
  • #1437 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): महक → मँहक
  • #2116 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): डि़ → ड़ि
  • #2117 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): डि़ → ड़ि

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