बेला-चमेलीके फूल और हार मँह-मँह मँहक रहे थे। फूलोंपर झुंड-के-झुंड भौंरे गुंजार कर रहे थे। सुन्दर-सुन्दर झरोखोंकी जालियोंमेंसे चन्द्रमाकी शुभ्र किरणें महलके भीतर छिटक रही थीं॥ ४॥✎ 143721162117
मल्लिकादामभिः पुष्पैर्द्विरेफकुलनादितैः।
जालरन्ध्रप्रविष्टैश्च गोभिश्चन्द्रमसोऽमलैः॥ ४
बेला-चमेलीके फूल और हार मँह-मँह मँहक रहे थे। फूलोंपर झुंड-के-झुंड भौंरे गुंजार कर रहे थे। सुन्दर-सुन्दर झरोखोंकी जालियोंमेंसे चन्द्रमाकी शुभ्र किरणें महलके भीतर छिटक रही थीं॥ ४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.60.4 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 510) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/60/4/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)