भगवान् श्रीकृष्णने कहा—विदर्भनन्दिनी! तुम मुझसे बुरा मत मानना। मुझसे रूठना नहीं। मैं जानता हूँ कि तुम एकमात्र मेरे ही परायण हो। मेरी प्रिय सहचरी! तुम्हारी प्रेमभरी बात सुननेके लिये ही मैंने हँसी-हँसीमें यह छलना की थी॥ २९॥✎ 2119
मा मा वैदर्भ्यसूयेथा जाने त्वां मत्परायणाम्।
त्वद्वचः श्रोतुकामेन क्ष्वेल्याऽऽचरितमंगने॥ २९
भगवान् श्रीकृष्णने कहा—विदर्भनन्दिनी! तुम मुझसे बुरा मत मानना। मुझसे रूठना नहीं। मैं जानता हूँ कि तुम एकमात्र मेरे ही परायण हो। मेरी प्रिय सहचरी! तुम्हारी प्रेमभरी बात सुननेके लिये ही मैंने हँसी-हँसीमें यह छलना की थी॥ २९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.60.29 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 514) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/60/29/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)