मैं देखना चाहता था कि मेरे यों कहनेपर तुम्हारे लाल-लाल होठ प्रणय-कोपसे किस प्रकार फड़कने लगते हैं। तुम्हारे कटाक्षपूर्वक देखनेसे नेत्रोंमें कैसी लाली छा जाती है और भौंहें चढ़ जानेके कारण तुम्हारा मुँह कैसा सुन्दर लगता है॥ ३०॥✎ 2119
मुखं च प्रेमसंरम्भस्फुरिताधरमीक्षितुम्।
कटाक्षेपारुणापांगं सुन्दरभ्रुकुटीतटम्॥ ३०
मैं देखना चाहता था कि मेरे यों कहनेपर तुम्हारे लाल-लाल होठ प्रणय-कोपसे किस प्रकार फड़कने लगते हैं। तुम्हारे कटाक्षपूर्वक देखनेसे नेत्रोंमें कैसी लाली छा जाती है और भौंहें चढ़ जानेके कारण तुम्हारा मुँह कैसा सुन्दर लगता है॥ ३०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.60.30 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 514) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/60/30/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)