श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.60.28

दशम स्कन्ध · अध्याय 60 · अथ षष्टितमोऽध्यायः

सान्त्वयामास सान्त्वज्ञः कृपया कृपणां प्रभुः।

हास्यप्रौढिभ्रमच्चित्तामतदर्हां सतां गतिः॥ २८

sāntvayāmāsa sāntvajñaḥ kṛpayā kṛpaṇāṃ prabhuḥ|

hāsyaprauḍhibhramaccittāmatadarhāṃ satāṃ gatiḥ|| 28

अर्थ

भगवान् श्रीकृष्ण समझाने-बुझानेमें बड़े कुशल और अपने प्रेमी भक्तोंके एकमात्र आश्रय हैं। जब उन्होंने देखा कि हास्यकी गम्भीरताके कारण रुक्मिणीजीकी बुद्धि चक्करमें पड़ गयी है और वे अत्यन्त दीन हो रही हैं, तब उन्होंने इस अवस्थाके अयोग्य अपनी प्रेयसी रुक्मिणीजीको समझाया॥ २८॥

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