श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.60.20

दशम स्कन्ध · अध्याय 60 · अथ षष्टितमोऽध्यायः

उदासीना वयं नूनं न स्त्र्यपत्यार्थकामुकाः।✎ 2118

आत्मलब्ध्याऽऽस्महे पूर्णा गेहयोर्ज्योतिरक्रियाः॥ २०

udāsīnā vayaṃ nūnaṃ na stryapatyārthakāmukāḥ|

ātmalabdhyā''smahe pūrṇā gehayorjyotirakriyāḥ|| 20

अर्थ

निश्‍चय ही हम उदासीन हैं। हम स्त्री, सन्तान और धनके लोलुप नहीं हैं। निष्क्रिय और देह-गेहसे सम्बन्धरहित दीपशिखाके समान साक्षीमात्र हैं। हम अपने आत्माके साक्षात्कारसे ही पूर्णकाम हैं, कृतकृत्य हैं॥ २०॥✎ 1438

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #1438 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): विदर्भ-राजकुमारी! → विदर्भराजकुमारी!
  • #2118 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): स्त्रॺपत्या → स्त्र्यपत्या

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