श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.60.19

दशम स्कन्ध · अध्याय 60 · अथ षष्टितमोऽध्यायः

तेषां वीर्यमदान्धानां दृप्तानां स्मयनुत्तये।

आनीतासि मया भद्रे तेजोऽपहरतासताम्॥ १९

teṣāṃ vīryamadāndhānāṃ dṛptānāṃ smayanuttaye|

ānītāsi mayā bhadre tejo'paharatāsatām|| 19

अर्थ

कल्याणी! वे सब बल-पौरुषके मदसे अंधे हो रहे थे, अपने सामने किसीको कुछ नहीं गिनते थे। उन दुष्टोंका मान मर्दन करनेके लिये ही मैंने तुम्हारा हरण किया था और कोई कारण नहीं था॥ १९॥✎ 1438

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1438 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): विदर्भ-राजकुमारी! → विदर्भराजकुमारी!

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