श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.60.15

दशम स्कन्ध · अध्याय 60 · अथ षष्टितमोऽध्यायः

ययोरात्मसमं वित्तं जन्मैश्‍वर्याकृतिर्भवः।

तयोर्विवाहो मैत्री च नोत्तमाधमयोः क्‍वचित्॥ १५

yayorātmasamaṃ vittaṃ janmaiśvaryākṛtirbhavaḥ|

tayorvivāho maitrī ca nottamādhamayoḥ kvacit|| 15

अर्थ

जिनका धन, कुल, ऐश्‍वर्य, सौन्दर्य और आय अपने समान होती है—उन्हींसे विवाह और मित्रताका सम्बन्ध करना चाहिये। जो अपनेसे श्रेष्ठ या अधम हों, उनसे नहीं करना चाहिये॥ १५॥✎ 1438

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1438 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): विदर्भ-राजकुमारी! → विदर्भराजकुमारी!

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