तस्मात् प्रायेण न ह्याढ्या मां भजन्ति सुमध्यमे॥ १४
niṣkiṃcanā vayaṃ śaśvanniṣkiṃcanajanapriyāḥ|
tasmāt prāyeṇa na hyāḍhyā māṃ bhajanti sumadhyame|| 14
अर्थ
सुन्दरी! हम तो सदाके अकिंचन हैं। न तो हमारे पास कभी कुछ था और न रहेगा। ऐसे ही अकिंचन लोगोंसे हम प्रेम भी करते हैं और वे लोग भी हमसे प्रेम करते हैं। यही कारण है कि अपनेको धनी समझनेवाले लोग प्रायः हमसे प्रेम नहीं करते, हमारी सेवा नहीं करते॥ १४॥✎ 1438
निष्किंचना वयं शश्वन्निष्किंचनजनप्रियाः।
तस्मात् प्रायेण न ह्याढ्या मां भजन्ति सुमध्यमे॥ १४
सुन्दरी! हम तो सदाके अकिंचन हैं। न तो हमारे पास कभी कुछ था और न रहेगा। ऐसे ही अकिंचन लोगोंसे हम प्रेम भी करते हैं और वे लोग भी हमसे प्रेम करते हैं। यही कारण है कि अपनेको धनी समझनेवाले लोग प्रायः हमसे प्रेम नहीं करते, हमारी सेवा नहीं करते॥ १४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.60.14 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 512) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/60/14/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#1438 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): विदर्भ-राजकुमारी! → विदर्भराजकुमारी!