श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.60.1

दशम स्कन्ध · अध्याय 60 · अथ षष्टितमोऽध्यायः

अथ षष्टितमोऽध्यायः

श्रीकृष्ण-रुक्मिणी-संवाद

श्रीशुक उवाच

कर्हिचित् सुखमासीनं स्वतल्पस्थं जगद्गुरुम्।

पतिं पर्यचरद् भैष्मी व्यजनेन सखीजनैः॥ १

karhicit sukhamāsīnaṃ svatalpasthaṃ jagadgurum|

patiṃ paryacarad bhaiṣmī vyajanena sakhījanaiḥ|| 1

अर्थ

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! एक दिन समस्त जगत‍्के परमपिता और ज्ञानदाता भगवान् श्रीकृष्ण रुक्मिणीजीके पलँगपर आरामसे बैठे हुए थे। भीष्मकनन्दिनी श्रीरुक्मिणीजी सखियोंके साथ अपने पतिदेवकी सेवा कर रही थीं, उन्हें पंखा झल रही थीं॥ १॥✎ 1437 2116 2117

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)
  • #1437 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): महक → मँहक
  • #2116 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): डि़ → ड़ि
  • #2117 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): डि़ → ड़ि

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