श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.59.45

दशम स्कन्ध · अध्याय 59 · अथैकोनषष्टितमोऽध्यायः

प्रत्युद्गमासनवरार्हणपादशौच-

ताम्बूलविश्रमणवीजनगन्धमाल्यैः ।

केशप्रसारशयनस्नपनोपहार्यै-

र्दासीशता अपि विभोर्विदधुः स्म दास्यम्॥ ४५

pratyudgamāsanavarārhaṇapādaśauca-

tāmbūlaviśramaṇavījanagandhamālyaiḥ |

keśaprasāraśayanasnapanopahāryai-

rdāsīśatā api vibhorvidadhuḥ sma dāsyam|| 45

अर्थ

उनमेंसे सभी पत्‍नियोंके साथ सेवा करनेके लिये सैकड़ों दासियाँ रहतीं, फिर भी जब उनके महलमें भगवान् पधारते तब वे स्वयं आगे जाकर आदरपूर्वक उन्हें लिवा लातीं, श्रेष्ठ आसनपर बैठातीं, उत्तम सामग्रियोंसे पूजा करतीं, चरणकमल पखारतीं, पान लगाकर खिलातीं, पाँव दबाकर थकावट दूर करतीं, पंखा झलतीं, इत्र-फुलेल, चन्दन आदि लगातीं, फूलोंके हार पहनातीं, केश सँवारतीं, सुलातीं, स्नान करातीं और अनेक प्रकारके भोजन कराकर अपने ही हाथों भगवान्‌की सेवा करतीं॥ ४५॥

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दशमस्कन्धे उत्तरार्धे
पारिजातहरणनरकवधो नाम एकोनषष्टितमोऽध्यायः॥ ५९॥

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