श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.59.41

दशम स्कन्ध · अध्याय 59 · अथैकोनषष्टितमोऽध्यायः

ययाच आनम्य किरीटकोटिभिः

पादौ स्पृशन्‍नच्युतमर्थसाधनम्।

सिद्धार्थ एतेन विगृह्यते महा-

नहो सुराणां च तमो धिगाढ्यताम्॥ ४१

yayāca ānamya kirīṭakoṭibhiḥ

pādau spṛśannacyutamarthasādhanam|

siddhārtha etena vigṛhyate mahā-

naho surāṇāṃ ca tamo dhigāḍhyatām|| 41

अर्थ

परीक्षित्! देखो तो सही, जब इन्द्रको अपना काम बनाना था, तब तो उन्होंने अपना सिर झुकाकर मुकुटकी नोकसे भगवान् श्रीकृष्णके चरणोंका स्पर्श करके उनसे सहायताकी भिक्षा माँगी थी, परन्तु जब काम बन गया, तब उन्होंने उन्हीं भगवान् श्रीकृष्णसे लड़ाई ठान ली। सचमुच ये देवता भी बड़े तमोगुणी हैं और सबसे बड़ा दोष तो उनमें धनाढ्यताका है। धिक्कार है ऐसी धनाढ्यताको॥ ४१॥

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