भगवान्ने उसे सत्यभामाके महलके बगीचेमें लगा दिया। इससे उस बगीचेकी शोभा अत्यन्त बढ़ गयी। कल्पवृक्षके साथ उसके गन्ध और मकरन्दके लोभी भौंरे स्वर्गसे द्वारकामें चले आये थे॥ ४०॥
स्थापितः सत्यभामाया गृहोद्यानोपशोभनः।
अन्वगुर्भ्रमराः स्वर्गात् तद्गन्धासवलम्पटाः॥ ४०
भगवान्ने उसे सत्यभामाके महलके बगीचेमें लगा दिया। इससे उस बगीचेकी शोभा अत्यन्त बढ़ गयी। कल्पवृक्षके साथ उसके गन्ध और मकरन्दके लोभी भौंरे स्वर्गसे द्वारकामें चले आये थे॥ ४०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.59.40 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 509) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/59/40/