श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.59.40

दशम स्कन्ध · अध्याय 59 · अथैकोनषष्टितमोऽध्यायः

स्थापितः सत्यभामाया गृहोद्यानोपशोभनः।

अन्वगुर्भ्रमराः स्वर्गात् तद्गन्धासवलम्पटाः॥ ४०

sthāpitaḥ satyabhāmāyā gṛhodyānopaśobhanaḥ|

anvagurbhramarāḥ svargāt tadgandhāsavalampaṭāḥ|| 40

अर्थ

भगवान्‌ने उसे सत्यभामाके महलके बगीचेमें लगा दिया। इससे उस बगीचेकी शोभा अत्यन्त बढ़ गयी। कल्पवृक्षके साथ उसके गन्ध और मकरन्दके लोभी भौंरे स्वर्गसे द्वारकामें चले आये थे॥ ४०॥

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें