श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.58.30

दशम स्कन्ध · अध्याय 58 · अथाष्टपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

विन्दानुविन्दावावन्त्यौ दुर्योधनवशानुगौ।

स्वयंवरे स्वभगिनीं कृष्णे सक्तां न्यषेधताम्॥ ३०

vindānuvindāvāvantyau duryodhanavaśānugau|

svayaṃvare svabhaginīṃ kṛṣṇe saktāṃ nyaṣedhatām|| 30

अर्थ

अवन्ती (उज्जैन) देशके राजा थे विन्द और अनुविन्द। वे दुर्योधनके वशवर्ती तथा अनुयायी थे। उनकी बहिन मित्रविन्दाने स्वयंवरमें भगवान् श्रीकृष्णको ही अपना पति बनाना चाहा। परन्तु विन्द और अनुविन्दने अपनी बहिनको रोक दिया॥ ३०॥

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