परीक्षित्! मित्रविन्दा श्रीकृष्णकी फूआ राजाधिदेवीकी कन्या थी। भगवान् श्रीकृष्ण राजाओंकी भरी सभामें उसे बलपूर्वक हर ले गये, सब लोग अपना-सा मुँह लिये देखते ही रह गये॥ ३१॥
राजाधिदेव्यास्तनयां मित्रविन्दां पितृष्वसुः।
प्रसह्य हृतवान् कृष्णो राजन् राज्ञां प्रपश्यताम्॥ ३१
परीक्षित्! मित्रविन्दा श्रीकृष्णकी फूआ राजाधिदेवीकी कन्या थी। भगवान् श्रीकृष्ण राजाओंकी भरी सभामें उसे बलपूर्वक हर ले गये, सब लोग अपना-सा मुँह लिये देखते ही रह गये॥ ३१॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.58.31 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 500) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/58/31/