श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.58.29

दशम स्कन्ध · अध्याय 58 · अथाष्टपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

अथोपयेमे कालिन्दीं सुपुण्यर्त्वृक्ष ऊर्जिते।

वितन्वन् परमानन्दं स्वानां परममंगलम्॥ २९

athopayeme kālindīṃ supuṇyartvṛkṣa ūrjite|

vitanvan paramānandaṃ svānāṃ paramamaṃgalam|| 29

अर्थ

वहाँ आकर उन्होंने विवाहके योग्य ऋतु और ज्यौतिष-शास्त्रके अनुसार प्रशंसित पवित्र ल‌ग्‍नमें कालिन्दीजीका पाणिग्रहण किया। इससे उनके स्वजन-सम्बन्धियोंको परम मंगल और परमानन्दकी प्राप्ति हुई॥ २९॥

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