श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.53.47

दशम स्कन्ध · अध्याय 53 · अथ त्रिपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

अद्भिर्गन्धाक्षतैर्धूपैर्वासःस्रङ्माल्यभूषणैः।

नानोपहारबलिभिः प्रदीपावलिभिः पृथक्॥ ४७

adbhirgandhākṣatairdhūpairvāsaḥsraṅmālyabhūṣaṇaiḥ|

nānopahārabalibhiḥ pradīpāvalibhiḥ pṛthak|| 47

अर्थ

इसके बाद रुक्मिणीजीने जल, गन्ध, अक्षत, धूप, वस्त्र, पुष्पमाला, हार, आभूषण, अनेकों प्रकारके नैवेद्य, भेंट और आरती आदि सामग्रियोंसे अम्बिकादेवीकी पूजा की॥ ४७॥

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