रुक्मिणीजीने भगवतीसे प्रार्थना की—‘अम्बिकामाता! आपकी गोदमें बैठे हुए आपके प्रिय पुत्र गणेशजीको तथा आपको मैं बार-बार नमस्कार करती हूँ। आप ऐसा आशीर्वाद दीजिये कि मेरी अभिलाषा पूर्ण हो। भगवान् श्रीकृष्ण ही मेरे पति हों’॥ ४६॥
नमस्ये त्वाम्बिकेऽभीक्ष्णं स्वसन्तानयुतां शिवाम्।
भूयात् पतिर्मे भगवान् कृष्णस्तदनुमोदताम्॥ ४६
रुक्मिणीजीने भगवतीसे प्रार्थना की—‘अम्बिकामाता! आपकी गोदमें बैठे हुए आपके प्रिय पुत्र गणेशजीको तथा आपको मैं बार-बार नमस्कार करती हूँ। आप ऐसा आशीर्वाद दीजिये कि मेरी अभिलाषा पूर्ण हो। भगवान् श्रीकृष्ण ही मेरे पति हों’॥ ४६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.53.46 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 472) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/53/46/