॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.53.41
यतवाङ्मातृभिः सार्धं सखीभिः परिवारिता।
गुप्ता राजभटैः शूरैः सन्नद्धैरुद्यतायुधैः।
मृदंगशंखपणवास्तूर्यभेर्यश्च जघ्निरे॥ ४१
yatavāṅmātṛbhiḥ sārdhaṃ sakhībhiḥ parivāritā|
guptā rājabhaṭaiḥ śūraiḥ sannaddhairudyatāyudhaiḥ|
mṛdaṃgaśaṃkhapaṇavāstūryabheryaśca jaghnire|| 41
अर्थ
वे स्वयं मौन थीं और माताएँ तथा सखी-सहेलियाँ सब ओरसे उन्हें घेरे हुए थीं। शूरवीर राजसैनिक हाथोंमें अस्त्र-शस्त्र उठाये, कवच पहने उनकी रक्षा कर रहे थे। उस समय मृदंग, शंख, ढोल, तुरही और भेरी आदि बाजे बज रहे थे॥ ४१॥✎ 1687