श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.53.41

दशम स्कन्ध · अध्याय 53 · अथ त्रिपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

यतवाङ्मातृभिः सार्धं सखीभिः परिवारिता।

गुप्ता राजभटैः शूरैः सन्‍नद्धैरुद्यतायुधैः।

मृदंगशंखपणवास्तूर्यभेर्यश्‍च जघ्निरे॥ ४१

yatavāṅmātṛbhiḥ sārdhaṃ sakhībhiḥ parivāritā|

guptā rājabhaṭaiḥ śūraiḥ sannaddhairudyatāyudhaiḥ|

mṛdaṃgaśaṃkhapaṇavāstūryabheryaśca jaghnire|| 41

अर्थ

वे स्वयं मौन थीं और माताएँ तथा सखी-सहेलियाँ सब ओरसे उन्हें घेरे हुए थीं। शूरवीर राजसैनिक हाथोंमें अस्त्र-शस्त्र उठाये, कवच पहने उनकी रक्षा कर रहे थे। उस समय मृदंग, शंख, ढोल, तुरही और भेरी आदि बाजे बज रहे थे॥ ४१॥✎ 1687

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1687 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: पुरवासी-लोग → पुरवासीलोग

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें