श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.53.40

दशम स्कन्ध · अध्याय 53 · अथ त्रिपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

पद‍्भ्यां विनिर्ययौ द्रष्टुं भवान्याः पादपल्लवम्।

सा चानुध्यायती सम्यङ्मुकुन्दचरणाम्बुजम्॥ ४०

padbhyāṃ viniryayau draṣṭuṃ bhavānyāḥ pādapallavam|

sā cānudhyāyatī samyaṅmukundacaraṇāmbujam|| 40

अर्थ

वे प्रेममूर्ति श्रीकृष्णचन्द्रके चरण-कमलोंका चिन्तन करती हुई भगवती भवानीके पाद-पल्लवोंका दर्शन करनेके लिये पैदल ही चलीं॥ ४०॥✎ 1687

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1687 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: पुरवासी-लोग → पुरवासीलोग

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