श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.51.60

दशम स्कन्ध · अध्याय 51 · अथैकपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

प्रलोभितो वरैर्यत्त्वमप्रमादाय विद्धि तत्।

न धीर्मय्येकभक्तानामाशीर्भिर्भिद्यते क्‍वचित्॥ ६०

pralobhito varairyattvamapramādāya viddhi tat|

na dhīrmayyekabhaktānāmāśīrbhirbhidyate kvacit|| 60

अर्थ

मैंने तुम्हें जो वर देनेका प्रलोभन दिया, वह केवल तुम्हारी सावधानीकी परीक्षाके लिये। मेरे जो अनन्य भक्त होते हैं, उनकी बुद्धि कभी कामनाओंसे इधर-उधर नहीं भटकती॥ ६०॥

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