श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.51.61

दशम स्कन्ध · अध्याय 51 · अथैकपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

युंजानानामभक्तानां प्राणायामादिभिर्मनः।

अक्षीणवासनं राजन् दृश्यते पुनरुत्थितम्॥ ६१

yuṃjānānāmabhaktānāṃ prāṇāyāmādibhirmanaḥ|

akṣīṇavāsanaṃ rājan dṛśyate punarutthitam|| 61

अर्थ

जो लोग मेरे भक्त नहीं होते, वे चाहे प्राणायाम आदिके द्वारा अपने मनको वशमें करनेका कितना ही प्रयत्‍न क्यों न करें, उनकी वासनाएँ क्षीण नहीं होतीं और राजन्! उनका मन फिरसे विषयोंके लिये मचल पड़ता है॥ ६१॥

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