श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.51.58

दशम स्कन्ध · अध्याय 51 · अथैकपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

चिरमिह वृजिनार्तस्तप्यमानोऽनुतापै-

रवितृषषडमित्रोऽलब्धशान्तिः कथंचित्।

शरणद समुपेतस्त्वत्पदाब्जं परात्म-

न्‍नभयमृतमशोकं पाहि माऽऽपन्‍नमीश॥ ५८

ciramiha vṛjinārtastapyamāno'nutāpai-

ravitṛṣaṣaḍamitro'labdhaśāntiḥ kathaṃcit|

śaraṇada samupetastvatpadābjaṃ parātma-

nnabhayamṛtamaśokaṃ pāhi mā''pannamīśa|| 58

अर्थ

भगवन्! मैं अनादिकालसे अपने कर्मफलोंको भोगते-भोगते अत्यन्त आर्त हो रहा था, उनकी दुःखद ज्वाला रात-दिन मुझे जलाती रहती थी। मेरे छः शत्रु (पाँच इन्द्रिय और एक मन) कभी शान्त न होते थे, उनकी विषयोंकी प्यास बढ़ती ही जा रही थी। कभी किसी प्रकार एक क्षणके लिये भी मुझे शान्ति न मिली। शरणदाता! अब मैं आपके भय, मृत्यु और शोकसे रहित चरणकमलोंकी शरणमें आया हूँ। सारे जगत‍्के एकमात्र स्वामी! परमात्मन्! आप मुझ शरणागतकी रक्षा कीजिये॥ ५८॥

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