॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.51.57
तस्माद् विसृज्याशिष ईश सर्वतो
रजस्तमःसत्त्वगुणानुबन्धनाः ।
निरंजनं निर्गुणमद्वयं परं
त्वां ज्ञप्तिमात्रं पुरुषं व्रजाम्यहम्॥ ५७
tasmād visṛjyāśiṣa īśa sarvato
rajastamaḥsattvaguṇānubandhanāḥ |
niraṃjanaṃ nirguṇamadvayaṃ paraṃ
tvāṃ jñaptimātraṃ puruṣaṃ vrajāmyaham|| 57
अर्थ
इसलिये प्रभो! मैं सत्त्वगुण, रजोगुण और तमोगुणसे सम्बन्ध रखनेवाली समस्त कामनाओंको छोड़कर केवल मायाके लेशमात्र सम्बन्धसे रहित, गुणातीत, एक—अद्वितीय, चित्स्वरूप परमपुरुष आपकी शरण ग्रहण करता हूँ॥ ५७॥