श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.51.56

दशम स्कन्ध · अध्याय 51 · अथैकपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

न कामयेऽन्यं तव पादसेवना-

दकिञ्चनप्रार्थ्यतमाद् वरं विभो।

आराध्य कस्त्वां ह्यपवर्गदं हरे

वृणीत आर्यो वरमात्मबन्धनम्॥ ५६

na kāmaye'nyaṃ tava pādasevanā-

dakiñcanaprārthyatamād varaṃ vibho|

ārādhya kastvāṃ hyapavargadaṃ hare

vṛṇīta āryo varamātmabandhanam|| 56

अर्थ

अन्तर्यामी प्रभो! आपसे क्या छिपा है? मैं आपके चरणोंकी सेवाके अतिरिक्त और कोई भी वर नहीं चाहता; क्योंकि जिनके पास किसी प्रकारका संग्रह-परिग्रह नहीं है अथवा जो उसके अभिमानसे रहित हैं, वे लोग भी केवल उसीके लिये प्रार्थना करते रहते हैं। भगवन्! भला, बतलाइये तो सही—मोक्ष देनेवाले आपकी आराधना करके ऐसा कौन श्रेष्ठ पुरुष होगा, जो अपनेको बाँधनेवाले सांसारिक विषयोंका वर माँगे॥ ५६॥

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