श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.51.37

दशम स्कन्ध · अध्याय 51 · अथैकपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

श्रीभगवानुवाच

जन्मकर्माभिधानानि सन्ति मेऽङ्ग सहस्रशः।

न शक्यन्तेऽनुसंख्यातुमनन्तत्वान्मयापि हि॥ ३७

janmakarmābhidhānāni santi me'ṅga sahasraśaḥ|

na śakyante'nusaṃkhyātumanantatvānmayāpi hi|| 37

अर्थ

भगवान् श्रीकृष्णने कहा—प्रिय मुचुकुन्द! मेरे हजारों जन्म, कर्म और नाम हैं। वे अनन्त हैं, इसलिये मैं भी उनकी गिनती करके नहीं बतला सकता॥ ३७॥

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