श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.51.34

दशम स्कन्ध · अध्याय 51 · अथैकपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

सोऽपि भस्मीकृतो नूनमात्मीयेनैव१ पाप्मना।

अनन्तरं भवाञ्छ्रीमान् लक्षितोऽमित्रशातनः२॥ ३४

so'pi bhasmīkṛto nūnamātmīyenaiva pāpmanā|

anantaraṃ bhavāñchrīmān lakṣito'mitraśātanaḥ|| 34

अर्थ

अवश्य उसके पापोंने ही उसे जलाकर भस्म कर दिया है। इसके बाद शत्रुओंके नाश करनेवाले परम सुन्दर आपने मुझे दर्शन दिया॥ ३४॥

टिप्पणियाँ

  1. १

    मात्मजेनैव।

    (मुद्रित पृष्ठ 456)
  2. २

    नाशनः।

     

    (मुद्रित पृष्ठ 456)

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