श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.51.33

दशम स्कन्ध · अध्याय 51 · अथैकपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

चिरप्रजागरश्रान्तो निद्रयोपहतेन्द्रियः।

शयेऽस्मिन् विजने कामं केनाप्युत्थापितोऽधुना॥ ३३

ciraprajāgaraśrānto nidrayopahatendriyaḥ|

śaye'smin vijane kāmaṃ kenāpyutthāpito'dhunā|| 33

अर्थ

बहुत दिनोंतक जागते रहनेके कारण मैं थक गया था। निद्राने मेरी समस्त इन्द्रियोंकी शक्ति छीन ली थी, उन्हें बेकाम कर दिया था, इसीसे मैं इस निर्जन स्थानमें निर्द्वन्द्व सो रहा था। अभी-अभी किसीने मुझे जगा दिया॥ ३३॥

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