श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.51.32

दशम स्कन्ध · अध्याय 51 · अथैकपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

वयं तु पुरुषव्याघ्र ऐक्ष्वाकाः क्षत्रबन्धवः।

मुचुकुन्द इति प्रोक्तो यौवनाश्‍वात्मजः प्रभो॥ ३२

vayaṃ tu puruṣavyāghra aikṣvākāḥ kṣatrabandhavaḥ|

mucukunda iti prokto yauvanāśvātmajaḥ prabho|| 32

अर्थ

और पुरुषोत्तम! यदि आप हमारे बारेमें पूछें तो हम इक्ष्वाकुवंशी क्षत्रिय हैं, मेरा नाम है मुचुकुन्द। और प्रभु! मैं युवनाश्‍वनन्दन महाराज मान्धाताका पुत्र हूँ॥ ३२॥

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