श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.16.63

दशम स्कन्ध · अध्याय 16 · अथ षोडशोऽध्यायः

द्वीपं रमणकं हित्वा ह्रदमेतमुपाश्रितः।✎ 1146

यद्भयात् स सुपर्णस्त्वां नाद्यान्मत्पादलाञ्छितम्॥ ६३

dvīpaṃ ramaṇakaṃ hitvā hradametamupāśritaḥ|

yadbhayāt sa suparṇastvāṃ nādyānmatpādalāñchitam|| 63

अर्थ

मैं जानता हूँ कि तू गरुडके भयसे रमणक द्वीप छोड़कर इस दहमें आ बसा था। अब तेरा शरीर मेरे चरणचिह्नोंसे अंकित हो गया है। इसलिये जा, अब गरुड तुझे खायेंगे नहीं॥ ६३॥

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1146 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): हृदमेतमुपाश्रित:। → ह्रदमेतमुपाश्रितः।

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