श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.16.62

दशम स्कन्ध · अध्याय 16 · अथ षोडशोऽध्यायः

योऽस्मिन् स्नात्वा मदाक्रीडे देवादींस्तर्पयेज्जलैः।

उपोष्य मां स्मरन्‍नर्चेत् सर्वपापैः प्रमुच्यते॥ ६२

yo'smin snātvā madākrīḍe devādīṃstarpayejjalaiḥ|

upoṣya māṃ smarannarcet sarvapāpaiḥ pramucyate|| 62

अर्थ

मैंने इस कालियदहमें क्रीड़ा की है। इसलिये जो पुरुष इसमें स्नान करके जलसे देवता और पितरोंका तर्पण करेगा, एवं उपवास करके मेरा स्मरण करता हुआ मेरी पूजा करेगा—वह सब पापोंसे मुक्त हो जायगा॥ ६२॥

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