श्रीशुकदेवजी कहते हैं—भगवान् श्रीकृष्णकी एक-एक लीला अद्भुत है। उनकी ऐसी आज्ञा पाकर कालिय नाग और उसकी पत्नियोंने आनन्दसे भरकर बड़े आदरसे उनकी पूजा की॥ ६४॥
एवमुक्तो भगवता कृष्णेनाद्भुतकर्मणा।
तं पूजयामास मुदा नागपत्न्यश्च सादरम्॥ ६४
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—भगवान् श्रीकृष्णकी एक-एक लीला अद्भुत है। उनकी ऐसी आज्ञा पाकर कालिय नाग और उसकी पत्नियोंने आनन्दसे भरकर बड़े आदरसे उनकी पूजा की॥ ६४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.16.64 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 248) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/16/64/