श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.13.20

दशम स्कन्ध · अध्याय 13 · अथ त्रयोदशोऽध्यायः

स्वयमात्माऽऽत्मगोवत्सान् प्रतिवार्यात्मवत्सपैः।

क्रीडन्‍नात्मविहारैश्‍च सर्वात्मा प्राविशद् व्रजम्॥ २०

svayamātmā''tmagovatsān prativāryātmavatsapaiḥ|

krīḍannātmavihāraiśca sarvātmā prāviśad vrajam|| 20

अर्थ

सर्वात्मा भगवान् स्वयं ही बछड़े बन गये और स्वयं ही ग्वालबाल । अपने आत्मस्वरूप बछड़ोंको अपने आत्मस्वरूप ग्वालबालोंके द्वारा घेरकर अपने ही साथ अनेकों प्रकारके खेल खेलते हुए उन्होंने व्रजमें प्रवेश किया॥ २०॥✎ 1419 2069

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #1419 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): छींके → छीके
  • #2069 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): डि़ → ड़ि

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