श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.13.19

दशम स्कन्ध · अध्याय 13 · अथ त्रयोदशोऽध्यायः

यावद् वत्सपवत्सकाल्पकवपुर्यावत् कराङ्‌घ्र्यादिकं ✎ 2068

यावद् यष्टिविषाणवेणुदलशिग् यावद् विभूषाम्बरम्।

यावच्छीलगुणाभिधाकृतिवयो यावद् विहारादिकं

सर्वं विष्णुमयं गिरोऽङ्गवदजः सर्वस्वरूपो बभौ॥ १९

yāvad vatsapavatsakālpakavapuryāvat karāṅghryādikaṃ

yāvad yaṣṭiviṣāṇaveṇudalaśig yāvad vibhūṣāmbaram|

yāvacchīlaguṇābhidhākṛtivayo yāvad vihārādikaṃ

sarvaṃ viṣṇumayaṃ giro'ṅgavadajaḥ sarvasvarūpo babhau|| 19

अर्थ

परीक्षित्! वे बालक और बछड़े संख्यामें जितने थे, जितने छोटे-छोटे उनके शरीर थे, उनके हाथ-पैर जैसे-जैसे थे, उनके पास जितनी और जैसी छड़ियाँ, सिंगी, बाँसुरी, पत्ते और छीके थे, जैसे और जितने वस्त्राभूषण थे, उनके शील, स्वभाव, गुण, नाम, रूप और अवस्थाएँ जैसी थीं, जिस प्रकार वे खाते-पीते और चलते थे, ठीक वैसे ही और उतने ही रूपोंमें सर्वस्वरूप भगवान् श्रीकृष्ण प्रकट हो गये। उस समय ‘यह सम्पूर्ण जगत् विष्णुरूप है’—यह वेदवाणी मानो मूर्तिमती होकर प्रकट हो गयी॥ १९॥✎ 1419 2069

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)
  • #1419 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): छींके → छीके
  • #2068 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): ङ्‌घ्रॺादिकं → ङ्‌घ्र्यादिकं
  • #2069 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): डि़ → ड़ि

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