श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.12.6

दशम स्कन्ध · अध्याय 12 · अथ द्वादशोऽध्यायः

यदि दूरं गतः कृष्णो वनशोभेक्षणाय तम्।

अहं पूर्वमहं पूर्वमिति संस्पृश्य रेमिरे॥ ६

yadi dūraṃ gataḥ kṛṣṇo vanaśobhekṣaṇāya tam|

ahaṃ pūrvamahaṃ pūrvamiti saṃspṛśya remire|| 6

अर्थ

यदि श्यामसुन्दर श्रीकृष्ण वनकी शोभा देखनेके लिये कुछ आगे बढ़ जाते, तो ‘पहले मैं छुऊँगा, पहले मैं छुऊँगा’—इस प्रकार आपसमें होड़ लगाकर सब-के-सब उनकी ओर दौड़ पड़ते और उन्हें छू-छूकर आनन्दम‌ग्‍न हो जाते॥ ६॥✎ 1414 1415

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #1414 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): छींका → छीका
  • #1415 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): छींके, → छीके,

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