श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.12.7

दशम स्कन्ध · अध्याय 12 · अथ द्वादशोऽध्यायः

केचिद् वेणून् वादयन्तो ध्मान्तः शृंगाणि केचन।

केचिद् भृङ्गैः प्रगायन्तः कूजन्तः कोकिलैः परे॥ ७

kecid veṇūn vādayanto dhmāntaḥ śṛṃgāṇi kecana|

kecid bhṛṅgaiḥ pragāyantaḥ kūjantaḥ kokilaiḥ pare|| 7

अर्थ

कोई बाँसुरी बजा रहा है, तो कोई सिंगी ही फूँक रहा है। कोई-कोई भौंरोंके साथ गुनगुना रहे हैं, तो बहुत-से कोयलोंके स्वरमें स्वर मिलाकर ‘कुहू-कुहू’ कर रहे हैं॥ ७॥✎ 1414 1415

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #1414 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): छींका → छीका
  • #1415 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): छींके, → छीके,

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