कोई बाँसुरी बजा रहा है, तो कोई सिंगी ही फूँक रहा है। कोई-कोई भौंरोंके साथ गुनगुना रहे हैं, तो बहुत-से कोयलोंके स्वरमें स्वर मिलाकर ‘कुहू-कुहू’ कर रहे हैं॥ ७॥✎ 14141415
केचिद् वेणून् वादयन्तो ध्मान्तः शृंगाणि केचन।
केचिद् भृङ्गैः प्रगायन्तः कूजन्तः कोकिलैः परे॥ ७
कोई बाँसुरी बजा रहा है, तो कोई सिंगी ही फूँक रहा है। कोई-कोई भौंरोंके साथ गुनगुना रहे हैं, तो बहुत-से कोयलोंके स्वरमें स्वर मिलाकर ‘कुहू-कुहू’ कर रहे हैं॥ ७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.12.7 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 204) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/12/7/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)