श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.12.5

दशम स्कन्ध · अध्याय 12 · अथ द्वादशोऽध्यायः

मुष्णन्तोऽन्योन्यशिक्यादीन् ज्ञातानाराच्च चिक्षिपुः।

तत्रत्याश्‍च पुनर्दूराद्धसन्तश्‍च पुनर्ददुः॥ ५

muṣṇanto'nyonyaśikyādīn jñātānārācca cikṣipuḥ|

tatratyāśca punardūrāddhasantaśca punardaduḥ|| 5

अर्थ

कोई किसीका छीका चुरा लेता, तो कोई किसीकी बेंत या बाँसुरी। जब उन वस्तुओंके स्वामीको पता चलता, तब उन्हें लेनेवाला किसी दूसरेके पास दूर फेंक देता, दूसरा तीसरेके और तीसरा और भी दूर चौथेके पास। फिर वे हँसते हुए उन्हें लौटा देते॥ ५॥✎ 1414 1415

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #1414 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): छींका → छीका
  • #1415 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): छींके, → छीके,

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