॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक POST.4.39
कृष्णार्थीति धनार्थीति श्रोता वक्ता द्विधा मतः।
यथा वक्ता तथा श्रोता तत्र सौख्यं विवर्धते॥ ३९
kṛṣṇārthīti dhanārthīti śrotā vaktā dvidhā mataḥ|
yathā vaktā tathā śrotā tatra saukhyaṃ vivardhate|| 39
अर्थ
श्रोता और वक्ता भी दो प्रकारके माने गये हैं, एक श्रीकृष्णको चाहनेवाले और दूसरे धनको। जैसा वक्ता, वैसा ही श्रोता भी हो तो वहाँ कथामें रस मिलता है, अतः सुखकी वृद्धि होती है॥ ३९॥