उन्हींके अनुग्रहसे सहायता करनेवाले पुरुषको भी भागवत-सेवनका पुण्य प्राप्त होता है। कामना दो वस्तुओंकी होती है—श्रीकृष्णकी और धनकी। श्रीकृष्णके सिवा जो कुछ भी चाहा जाय, यह सब धनके अन्तर्गत है; उसकी ‘धन’ संज्ञा है॥ ३८॥
तदनुग्रहतोऽस्यापि श्रीभागवतसेवनम्।
श्रीकृष्णव्यतिरिक्तं यत्तत् सर्वं धनसंज्ञितम्॥ ३८
उन्हींके अनुग्रहसे सहायता करनेवाले पुरुषको भी भागवत-सेवनका पुण्य प्राप्त होता है। कामना दो वस्तुओंकी होती है—श्रीकृष्णकी और धनकी। श्रीकृष्णके सिवा जो कुछ भी चाहा जाय, यह सब धनके अन्तर्गत है; उसकी ‘धन’ संज्ञा है॥ ३८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण POST.4.38 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 1007) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/mahatmya/skanda/4/38/