श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक POST.2.18

श्रीमद्भागवतमाहात्म्य (स्कन्दपुराण) · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

सूत उवाच

एवमुक्तास्तु ताः पत्‍न्यः प्रसन्‍नां पुनरब्रुवन्।

उद्धवालोकनेनात्मप्रेष्ठसंगमलालसाः॥ १८

evamuktāstu tāḥ patnyaḥ prasannāṃ punarabruvan|

uddhavālokanenātmapreṣṭhasaṃgamalālasāḥ|| 18

अर्थ

सूतजी कहते हैं—ऋषिगण! जब उन्होंने इस प्रकार समझाया, तब श्रीकृष्णकी पत्‍नियाँ सदा प्रसन्‍न रहनेवाली यमुनाजीसे पुनः बोलीं। उस समय उनके हृदयमें इस बातकी बड़ी लालसा थी कि किसी उपायसे उद्धवजीका दर्शन हो, जिससे हमें अपने प्रियतमके नित्य संयोगका सौभाग्य प्राप्त हो सके॥ १८॥

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