श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक POST.1.32

श्रीमद्भागवतमाहात्म्य (स्कन्दपुराण) · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

नित्यास्तल्लिप्सवश्‍चैव देवाद्याश्‍चेति भेदतः।

देवाद्यास्तेषु कृष्णेन द्वारकां प्रापिताः पुरा॥ ३२

nityāstallipsavaścaiva devādyāśceti bhedataḥ|

devādyāsteṣu kṛṣṇena dvārakāṃ prāpitāḥ purā|| 32

अर्थ

उन तीनोंमें प्रथम तो उनकी श्रेणी है, जो भगवान्‌के नित्य ‘अन्तरंग’ पार्षद हैं—जिनका भगवान्‌से कभी वियोग होता ही नहीं। दूसरे वे हैं, जो एकमात्र भगवान्‌को पानेकी इच्छा रखते हैं—उनकी अन्तरंग-लीलामें अपना प्रवेश चाहते हैं। तीसरी श्रेणीमें देवता आदि हैं। इनमेंसे जो देवता आदिके अंशसे अवतीर्ण हुए थे, उन्हें भगवान्‌ने व्रजभूमिसे हटाकर पहले ही द्वारका पहुँचा दिया था॥ ३२॥✎ 908

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #908 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् से → भगवान्‌से

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